गांव का रुख
एक बार एक शहरी बाबू आए थे एक छोटे से गांव में।
उनका नाम यश था । वह बड़े हसमुख स्वभाव के एवं दयावान व्यक्तित्व के व्यक्ति थे । वह उस गांव में ग्रामीण जीवन पर रिसर्च एवं प्रैक्टिकल देखने आए थे ,की ग्रामीण जीवन बेहतर है,या शहरी जीवन । यश बाबू पहले दिन ग्रामीण जीवन का जायजा लेने पहुचे,पहले उन्होंने धान काट रहे किसानों को देखा और पूछा।
बाबा सुनते हो धूप तेज है,पसीना लगातार बह रहा है हवा का तो नामो निशान नहीं है । आप लोगो को दुख और पीड़ा मह्हूस नहीं होता क्या ।
इतने में किसान (हरिराम काका)बोले , बाबू जी ये मिट्टी हमारी मां है इसकी सेवा में कैसा दुख आपके भी तो माता पिता रहे होंगे न आप ने भी उनकी सेवा की होगी उनके पैर दबाए होंगे ,उनकी खूब सेवा की होगी ।आपको तो उस समय दुख महसूस नही हुआ होगा न आपको तो परमसुख का आनंद पहुंचा होगा ।इतने में यश बाबू को अपने माता पिता की याद आ गई जो सड़क दुर्घटना में मारे गए ,उन्हें वो पल याद आया जब वो उनकी सेवा करते थे । यश बाबू का पवित्र शीतल मन मिट्टी को चूमने में मजबूर हो गया ,वे बहुत ही पवित्र सोच के व्यक्ति थे उन्हे तुरंत आभाष हो गया की सच में ये खेत की मिट्टी मां समान है ,और इसकी सेवा करना तो परम धर्म है ।
यश बाबू बोले किसान काका हम भी इस मिट्टी की सेवा कर चाहते है हमे भी धान काटना है , कृपया हसिया दीजिए। किसान (हरिराम काका ) एवं बाकी किसान एक अमीर शहरी बाबू की ऐसी सादगी देख हैरान हो गय । उन्होंने हकलाते हुए कहा ,बाबूजी आप !आप धान काटना चाहते है ।यश बाबू ने कहा हां काका मैं इस परम सुख को अनुभव करना चाहता हु। सब दंग रह गए एक अमीर शहरी होकर भी ऐसे सादगी और नम्रता उन्होंने बाबू को हसीया दिया । यश बाबू ,हरिराम काका और बाकी किसान धान काटने लगे ।धान काट रहे,यश बाबू ने एक 17 साल के लड़के अनंत से पूछा तुम स्कूल तो जा हो न ?
अनंत ने कहा , हा भैया हम काम भी कर लेते है ,और खेत भी चले आते है इसी बीच पढ़ाई भी कर लेते है ।यश बाबू मन ही मन खुश हुए और कहने लगे वाह क्या बात है।उसने फिर पूछा क्या बनना चाहोगे ?उसने कहा जी हम कलेक्टर बनना चाहते है ।तब यश बाबू ने कहा सोच तो बहुत बड़ी है तुम्हारी ,इसी बीच अनंत ने कहा हम कलेक्टर भी बन जाएंगे तो भी अपनी किसानी नहीं छोड़ेंगे ।ये सुन यश बाबू को आभास हो गया ग्रामीण जीवन में सुख परम सुख है और किसानी एक सेवा है ।और ग्रामीण जीवन एक वरदान है ।


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